Posts

Showing posts from 2017

सूखी बारिश

Image
आह! बारिश तू जब आसमान से गिर धरती पर पड़ती है तो देखने वाले के मन को कितना सुकून देती है क्या तुझे पता है ? छम-छम करतीं तेरी ये बूँदें मन में इक अजीब सी खनक पैदा करती है उस खनक को सुन देखो पेड़ों के पत्ते जैसे झूम उठे बरसती बूंदों से सूखी पड़ी धरा में जान भर आई  चहचहाते पंछी फड़फड़ाते अपने पर भिगोने लगे और प्यासा सा मन तेरी ओर देखकर पूछने लगा ‘बारिश, तू क्या कभी इतनी गीली हो पाएगी कि मेरे इस सूखे पड़े मन को भिगो सके?’

काला-सफ़ेद

Image
रंग तू कितना बेरंग है खुद का कुछ न तेरा रोशनी है तो तू है कुछ नहीं जब है अँधेरा | पर फिर भी सब कुछ तुझी से है नीला आसमान, हरे पेड़ या भूरी धरा काले सफ़ेद के क्या मायने हैं इंसान फिर भी इन्ही में है घिरा | सफ़ेद रंग से चाहत लगा बैठा इंसान काला रंग आँखों को न भाया आँखें काली सुंदर लगीं पर काली त्वचा से जी घबराया | फिर त्वचा के रंग पर घमंड हो गया सफ़ेद तो ऊँचा, काला नीचा हो गया बहुत कोशिश हुई इस फर्क को नाकारने की पर रंग में रंग घुलने से पहले, रंग से रंग छिप गया | चाहत है बस ये भेद मिटाने की रंग से नहीं, पहचान इंसान की हो काले के नीचे सफ़ेद, या सफ़ेद के नीचे काला इन सबसे ऊपर इंसानियत बैठी हो |

चाय-पानी और पहरेदार

Image
पगडंडी पर चल रही हूँ लक्ष्य है आसमान छूने का पर सीढ़ियों पर पहरा है पहरेदार है एक मुच्छड़ मुश्टंडा मैंने क़दम आगे बढ़ाए तो बोल पड़ा , ‘ पहले मुझे सौंपो सोने की सौ अशरफ़ियाँ , तब ही आगे बढ़ने दूँगा ’ गर्दन ऊँची कर मैंने नाक सिकोड़ी ग़ुस्सा बहुत आया पर उसे पेट में दबा बोली , ‘ महाशय , आगे जाने दो मुझे रोक कर मुझे कर दोगे देवों को रूष्ट ’ फिर भी पहरेदार न माना और थक कर मैं वापस मुड़   चली   । पर हार ना मानी मैंने रोज़ जाती उसके पास ‘ जाने किस दिन उसका दिल पिघल जाए ?’ पर मुच्छड़ जितना दीखता , उतना ही कठोर अपनी बात पर बिलकुल अडिग रहा   । पहरेदार का पसंदीदा   चाय-पानी , खाकर जिसे सोता वो खर्राटे मार कर पर फिर भी पहरा तोड़ कर , मैंने सीढ़ियाँ चढ़ने की न सोची क्योंकि मैं डरती थी.. डर मेरा था उचित , या था कोई धोखा यह मैंने सोच कर भी न सोचा क्योंकि लक्ष्य पर तो पहुँचना ही था   । तो   माँ   के   पुश्तैनी   ज़ेवरात   पिघला   कर अशरफ़ियाँ बनवा दीं एक दिन और मुँह लटकाए , अशरफ़ियों की ...