चाय-पानी और पहरेदार
पगडंडी पर चल रही हूँ
लक्ष्य है आसमान छूने का
पर सीढ़ियों पर पहरा है
पहरेदार है एक मुच्छड़
मुश्टंडा
मैंने क़दम आगे बढ़ाए तो
बोल पड़ा,
‘पहले मुझे सौंपो सोने की सौ
अशरफ़ियाँ,
तब ही आगे बढ़ने दूँगा’
गर्दन ऊँची कर मैंने नाक
सिकोड़ी
ग़ुस्सा बहुत आया पर उसे
पेट में दबा बोली,
‘महाशय, आगे जाने दो मुझे
रोक कर मुझे कर दोगे देवों
को रूष्ट’
फिर भी पहरेदार न माना
और थक कर मैं वापस मुड़ चली ।
पर हार ना मानी मैंने
रोज़ जाती उसके पास
‘जाने किस दिन उसका दिल पिघल
जाए?’
पर मुच्छड़ जितना दीखता, उतना ही कठोर
अपनी बात पर बिलकुल अडिग
रहा ।
पहरेदार का पसंदीदा चाय-पानी,
खाकर जिसे सोता वो खर्राटे
मार कर
पर फिर भी पहरा तोड़ कर,
मैंने सीढ़ियाँ चढ़ने की न सोची
क्योंकि मैं डरती थी..
डर मेरा था उचित, या था कोई धोखा
यह मैंने सोच कर भी न सोचा
क्योंकि लक्ष्य पर तो
पहुँचना ही था ।
तो माँ के पुश्तैनी ज़ेवरात पिघला कर
अशरफ़ियाँ बनवा दीं एक दिन
और मुँह लटकाए, अशरफ़ियों की पोटली छुपाए
पहरेदार के पास फिर पहुँच
गयी ..
मैंने पोटली जैसे ही उसके
हाथ में थमाई,
उसके होटों के पीछे छुपे
पान-सने दाँत नज़र आए
और वो अदृश्य हो गया !
फिर आसमान से एक गरज़ती आवाज़ आई,
‘मूर्ख हो तुम ! बिना पहरे
की सीढ़ियाँ न ढूँढ पाए...’
और उसकी ‘हा हा हा हा हा’ हवा में घुल गयी...

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