काला-सफ़ेद
रंग तू कितना बेरंग है
खुद का कुछ न तेरा
रोशनी है तो तू है
कुछ नहीं जब है अँधेरा |
पर फिर भी सब कुछ तुझी से है
नीला आसमान, हरे पेड़ या भूरी धरा
काले सफ़ेद के क्या मायने हैं
इंसान फिर भी इन्ही में है घिरा |
सफ़ेद रंग से चाहत लगा बैठा इंसान
काला रंग आँखों को न भाया
आँखें काली सुंदर लगीं पर
काली त्वचा से जी घबराया |
फिर त्वचा के रंग पर घमंड हो गया
सफ़ेद तो ऊँचा, काला नीचा हो गया
बहुत कोशिश हुई इस फर्क को नाकारने की
पर रंग में रंग घुलने से पहले, रंग से
रंग छिप गया |
चाहत है बस ये भेद मिटाने की
रंग से नहीं, पहचान इंसान की हो
काले के नीचे सफ़ेद, या सफ़ेद के नीचे
काला
इन सबसे ऊपर इंसानियत बैठी हो |
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