मिट्टी और मैं
बचपन में मैं भी खेली थी
रेत और मिट्टी मेरी प्यारी सहेली थी
हाथ-पाँव मिट्टी में भर
बीमार होने से थी बेफिक्र
माँ की डांट सुनती थी
पर फिर भी मिट्टी में हाथ डुबोए
अपनी कल्पना के ताने-बाने बुनती थी
वोही मेरी बचपन की सहेली थी
मैं माटी से खूब खेली थी |
अजब ये पढ़ाई होती है
क्या-क्या मैंने सीख लिया
बड़े होते-होते मिट्टी से डर
मन में पैदा हो गया
गंदे होते हाथ मिट्टी से
होते बीमार मिट्टी से
कीटाणु होते हैं मिट्टी में
ये छोटे से दिमाग में भर गया |
डरती, हाथ धोती, छी-छी करती
मिटटी से मैं दूर हुई
जीवन के कुछ ऐसे भी वर्ष रहे
जब न मेरे हाथों, न पैरों को
सूखी या गीली मिट्टी स्पर्श हुई
फिर भी खुशबु सूंघती थी
वो पहली बारिश की
जब मिट्टी पर पड़ती थी
एक अजीब सी खुद लगती थी
पर फिर भी कुछ न करती थी |
फिर एक दिन माटी को स्पर्श किया
लगा बहुत समय बीत गया
वो पल आज भी याद है
उस पल में बहुत कुछ याद आ गया
पर फिर वही ज़िन्दगी
पाँव में चप्पल हरदम
हाथों में साबुन और सैनीटाईज़र की परतें
मिट्टी से फिर नाता टूट गया |
पर अजब जीवन का खेल है
मिट्टी से तो एक डोर से बंधे हैं
जिसे तोड़ नहीं सकते
आज जीवन के उस मोड़ पर खड़ी हूँ
जहाँ पर लोग मिट्टी से जुड़े हैं
जब नंगे पाँव चलती हूँ
और बेफिक्र मिट्टी को छूती हूँ
मन में यही ख्याल आता है
मिट्टी से ही है हम, इसी में मिल जाना है
तो फिर डर कैसा...
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