लालमय आसमान
आज सवेरे उठते ही
मन में ये ख्याल आया
देखूं आज सूर्योदय होते हुए
पहन पैर में चप्पल और आँखों
पर चश्मा
दृढ़ निश्चय कर,
मैं चली छत की ओर |
अभी अँधेरा छट चुका है
पर सूर्य नहीं है क्षितिज पर
पूरव दिशा में देख रही हूँ
आसमान में है कुछ लालिमा
चिड़िया की चहचहाहट भी है कुछ
जो सूरज के आने का संदेश दे
रही है |
आह ! लाल रंग, तू कहाँ छिपा था
ये पूछ पड़ा मेरा बागी मन
रोज़ है रहता तू इस जहान में
पर क्यों न देख पाई तुझे मैं
आँखें बंद रह जाती थीं मेरी
या आँखें खोलना ही न सीख
पाई ?
बढ़ रही है उस दिशा में आसमान
की लाली
ठहर जा, सब्र कर, आयेगा वो पल
जब चीरता हुआ उस लाल छटा को, होगा सूर्योदय
और बिखेर देगा वो लाल रंग
सबपर
जो अभी तक सिर्फ क्षितिज पर
था
तब लाल हो उठेगी ये सारी
दुनिया
और चारों तरफ उजाला होगा |
और चारों तरफ उजाला होगा |

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